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Tuesday, 12 December 2017

ग़ज़ल-

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन
221    2121    1221   212

जैसे ही फूल शाख़ से गिरकर बिखर गया
सारा चमन उदासियों में डूब मर गया

मुझको तो रौशनी की ज़रा भी तलब नहीं
दहलीज़ पर चिराग़ मेरी कौन धर गया

उलझा है तेरे प्यार के धागों में जबसे दिल
तबसे मेरी हयात का पैकर सँवर गया

अपशब्द चीखते हैं मोहल्ले में हर तरफ़
जाने ये किसकी आँख का पानी उतर गया

"घर की हरेक बात हवाओं को सौंप दो"
उफ़! कौन आके कान दीवारों के भर गया

ख़ुद को ही देख आईने में सोचता हूँ मैं
मासूम-सा जो शख़्स था इसमें किधर गया

मैसेज उसका आ ही गया आख़िरश मुझे
अनमोल! कॉल आया नहीं, दिन गुज़र गया

@ के. पी. अनमोल

Wednesday, 25 May 2016

ग़ज़ल

माँ की बातें गाँठ बाँध कर लौटा है
कुछ सौगातें गाँठ बाँध कर लौटा है

धूप न सर तक आयेगी अब शह्रों की
चाँदनी रातें गाँठ बाँध कर लौटा है

अबके जीत यक़ीनन समझो है उसकी
पिछली मातें गाँठ बाँध कर लौटा है

मुमकिन है के अब धरती की प्यास बुझे
वो बरसातें गाँठ बाँध कर लौटा है

संगत में अपनों की कुछ पल क्या बैठा
कितनी घातें गाँठ बाँध कर लौटा है

अभी अभी माज़ी से यादों की अनमोल
कुछ बारातें गाँठ बाँध कर लौटा है

- के.पी. अनमोल

Saturday, 21 May 2016

ग़ज़ल

एक क़िस्सा क्या अधूरा रह गया
ज़ीस्त का नक्शा अधूरा रह गया

वक़्त ने हर बार समझाया मगर
ज़ात का झगड़ा अधूरा रह गया

फिर सहन ये एक हो पाया नहीं
माई का सपना अधूरा रह गया

पीठ से ख़ंजर ने कर ली दोस्ती
और फिर बदला अधूरा रह गया

ज़ख्म जो था भर चुका कब का मगर
ये किरच-सा क्या अधूरा रह गया

तुम मिरे होकर रहे अनमोल और
भीड़ का गुस्सा अधूरा रह गया


- के. पी. अनमोल

Sunday, 8 May 2016

ग़ज़ल- ज़रा सोचिये

ज़रा सोचिये क्या से क्या हो गई
महब्बत तुम्हारी नशा हो गई

मेरा जिस्म परवाज़ करता रहा
हवा रूह लेकर हवा हो गई

पता तेरे दर का पता जब चला
तलब ख़ुल्द की लापता हो गई

मेरे पैर के आबले देखकर
रुकावट भी खुद रास्ता हो गई

अचानक हर इक काम बनने लगा
मेरे हक़ में किसकी दुआ हो गई

किसी रोज़ अनमोल कह दे ये तू
तेरा दिल चुरा कर ख़ता हो गई

- के. पी. अनमोल
ख़ुल्द= जन्नत, आबले= छाले

Thursday, 28 April 2016

ग़ज़ल- बात इतनी सोचना तुम

बात इतनी सोचना तुम हड़बड़ी को छोड़कर
चाँद पाकर क्या करोगे आदमी को छोड़कर

हाथ में उनके फ़कत तारीकियाँ ही रह गयीं
तुमसे पहले जो गये थे रोशनी को छोड़कर

ख़ाक पे आये तो आके ख़ाक में ही मिल गये
वो सफ़ीने जो कि आये थे नदी को छोड़कर

साथ देना चाहते हो साथ रहकर तो सुनो!
सब गवारा है मुझे धोखाधड़ी को छोड़कर

खेल, मस्ती, दोस्त, बचपन अब भी हैं दिल में बसे
दिन मगर चलते बने हैं इक कमी को छोड़कर

शाम गुज़री झील की गोदी में सूरज डाल के
यूँ लगा दादी चली है पोटली को छोड़कर

इस तरह अनमोल मुझमें हो गयी शामिल ग़ज़ल
जी रहा हूँ मैं उसे ही अब ख़ुदी को छोड़कर

- के. पी. अनमोल

Saturday, 23 April 2016

ग़ज़ल- मेरे सपने को तुम धोखा कहोगे

मेरे सपने को तुम धोखा कहोगे
अगर सच हो गया तो क्या कहोगे?

खड़ी की हैं हमीं ने ये दीवारें
कहो, अब भी इन्हें रस्ता कहोगे?

अदा मैंने किया है हक़ समझकर
न जाने तुम इसे क्या क्या कहोगे!

मैं अपनी रूह तुमको सौंप दूंगा
किसी दिन तो मुझे अपना कहोगे

मेरे संग बैठने की शर्त है इक
मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा कहोगे!

फ़सादों की यहाँ बस एक जड़ है
वही शय जिसको तुम पैसा कहोगे

तुम्हें अनमोल कह दे तीन आखर
पलटकर तुम उसे फिर क्या कहोगे?

- के.पी. अनमोल

Friday, 8 April 2016

ग़ज़ल- सच कहा तो

सच कहा तो झूठ को धक्का लगा
सच बताना! आपको कैसा लगा?

टूटकर जब गिर पड़े सब घोंसले
तब हवाओं को बड़ा सदमा लगा

है अलग बेटी का अपना इक वजूद
पर मुझे तो तेरा इक हिस्सा लगा

इक दफ़ा मुड़कर के देखेगी मुझे
झूठ था, बे-इंतहा सच्चा लगा

शाम, तनहाई, तुम्हारी याद, मैं
ख़ुशबुओं का घर मेरे मजमा लगा

ढह गयी दीवार इतना बोलकर
बाँटना घर को किसे अच्छा लगा

ये बता अनमोल इस बाज़ार में
मोल मेरी ज़ात का कितना लगा?

- के. पी. अनमोल

Wednesday, 23 March 2016

ग़ज़ल- सफ़ीना हर दफ़ा












ग़ज़ल-

सफ़ीना हर दफ़ा कोई किनारा ढूँढ लेता है
न हो माकूल मौसम फिर भी धारा ढूँढ लेता है

हवाओं का कि लहरों का या फिर बस एक तिनके का
जिसे हो पार होना, वो सहारा ढूँढ लेता है

बहुत मासूम है दिल गर बिछड़ जाये कोई अपना
फ़लक पर नाम का उसके सितारा ढूँढ लेता है

समंदर जज़्ब सीने में किये, यादों के जंगल में
मेरा मन क्यूँ गुजिश्ता वक़्त सारा ढूँढ लेता है

तड़पता है, मचलता है सहारा जब नहीं मिलता
मेरा ग़म मेरे सीने में गुज़ारा ढूँढ लेता है

मरासिम हैं तेरे अनमोल से क्या, ये नहीं मालूम
मगर जब दर्द हो, कंधा तुम्हारा ढूँढ लेता है

- के.पी. अनमोल

सफ़ीना= बेड़ा, माकूल= उचित, गुजिश्ता= बीताहुआ, मरासिम= संबंध