Thursday, 28 April 2016

ग़ज़ल- बात इतनी सोचना तुम

बात इतनी सोचना तुम हड़बड़ी को छोड़कर
चाँद पाकर क्या करोगे आदमी को छोड़कर

हाथ में उनके फ़कत तारीकियाँ ही रह गयीं
तुमसे पहले जो गये थे रोशनी को छोड़कर

ख़ाक पे आये तो आके ख़ाक में ही मिल गये
वो सफ़ीने जो कि आये थे नदी को छोड़कर

साथ देना चाहते हो साथ रहकर तो सुनो!
सब गवारा है मुझे धोखाधड़ी को छोड़कर

खेल, मस्ती, दोस्त, बचपन अब भी हैं दिल में बसे
दिन मगर चलते बने हैं इक कमी को छोड़कर

शाम गुज़री झील की गोदी में सूरज डाल के
यूँ लगा दादी चली है पोटली को छोड़कर

इस तरह अनमोल मुझमें हो गयी शामिल ग़ज़ल
जी रहा हूँ मैं उसे ही अब ख़ुदी को छोड़कर

- के. पी. अनमोल

Saturday, 23 April 2016

ग़ज़ल- मेरे सपने को तुम धोखा कहोगे

मेरे सपने को तुम धोखा कहोगे
अगर सच हो गया तो क्या कहोगे?

खड़ी की हैं हमीं ने ये दीवारें
कहो, अब भी इन्हें रस्ता कहोगे?

अदा मैंने किया है हक़ समझकर
न जाने तुम इसे क्या क्या कहोगे!

मैं अपनी रूह तुमको सौंप दूंगा
किसी दिन तो मुझे अपना कहोगे

मेरे संग बैठने की शर्त है इक
मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा कहोगे!

फ़सादों की यहाँ बस एक जड़ है
वही शय जिसको तुम पैसा कहोगे

तुम्हें अनमोल कह दे तीन आखर
पलटकर तुम उसे फिर क्या कहोगे?

- के.पी. अनमोल

Friday, 8 April 2016

ग़ज़ल- सच कहा तो

सच कहा तो झूठ को धक्का लगा
सच बताना! आपको कैसा लगा?

टूटकर जब गिर पड़े सब घोंसले
तब हवाओं को बड़ा सदमा लगा

है अलग बेटी का अपना इक वजूद
पर मुझे तो तेरा इक हिस्सा लगा

इक दफ़ा मुड़कर के देखेगी मुझे
झूठ था, बे-इंतहा सच्चा लगा

शाम, तनहाई, तुम्हारी याद, मैं
ख़ुशबुओं का घर मेरे मजमा लगा

ढह गयी दीवार इतना बोलकर
बाँटना घर को किसे अच्छा लगा

ये बता अनमोल इस बाज़ार में
मोल मेरी ज़ात का कितना लगा?

- के. पी. अनमोल