Tuesday, 12 December 2017

ग़ज़ल-

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन
221    2121    1221   212

जैसे ही फूल शाख़ से गिरकर बिखर गया
सारा चमन उदासियों में डूब मर गया

मुझको तो रौशनी की ज़रा भी तलब नहीं
दहलीज़ पर चिराग़ मेरी कौन धर गया

उलझा है तेरे प्यार के धागों में जबसे दिल
तबसे मेरी हयात का पैकर सँवर गया

अपशब्द चीखते हैं मोहल्ले में हर तरफ़
जाने ये किसकी आँख का पानी उतर गया

"घर की हरेक बात हवाओं को सौंप दो"
उफ़! कौन आके कान दीवारों के भर गया

ख़ुद को ही देख आईने में सोचता हूँ मैं
मासूम-सा जो शख़्स था इसमें किधर गया

मैसेज उसका आ ही गया आख़िरश मुझे
अनमोल! कॉल आया नहीं, दिन गुज़र गया

@ के. पी. अनमोल

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