Wednesday, 28 September 2016

ग़ज़ल

समंदर में समाने जा रही है
नदी ख़ुद को डुबाने जा रही है

बिलखते छोड़कर दोनों किनारे
किसे अपना बनाने जा रही है

बगल में डालकर थैला ये बच्ची
नहीं पढ़ने, कमाने जा रही है

लहू में तर-ब-तर फिर एक सरहद
जहाँ से गिड़गिड़ाने जा रही है

तुम्हारी याद दिल को हैक करके
मुझे फिर से सताने जा रही है

मेरी उम्मीद बंजर हौसलों पर
नये सपने उगाने जा रही है

परेशां आदमी से ज़ात मेरी
ख़ुदा को कुछ सुनाने जा रही है

यहाँ अनमोल इतना शोर सुनकर
ख़मोशी बड़बड़ाने जा रही है

- के. पी. अनमोल

Monday, 12 September 2016

ग़ज़ल-

जब कभी भी शहर में दंगा हुआ
जी सियासत का बहुत हल्का हुआ

आसमां में इक अजब-सा शोर है
बादलों के बीच क्या फितना हुआ

चाह, ख़ुशियाँ, फिर उमीदें और गिले
प्यार का यूँ अश्क़ से रिश्ता हुआ

इक तरफ मोनालिसा तस्वीर में
इक तरफ चेहरा तेरा खिलता हुआ

अहमियत है बस यहाँ पे रूह की
बाद इसके यह बदन ढेला हुआ

मन अचानक चल दिया है गाँव को
क्या पता अनमोल इसको क्या हुआ

- के. पी. अनमोल

Thursday, 4 August 2016

ग़ज़ल-


खून-ए-दिल से लफ्ज़ मुअत्तर करता है
क्या क्या जादू एक सुख़नवर करता है

रात रात भर ख़ुद ही ख़ुद में जग जगकर
दुनिया भर की सोच मुनव्वर करता है

मेरा बेड़ा मंझधारों में उलझा के
एक छलावा रोज़ समन्दर करता है

पेशानी पर बोसा तेरी चाहत का
दिल पर कितने जंतर-मंतर करता है

गैरों को मुस्कान बाँटने वाला ही
मातम अक्सर अंदर अंदर करता है

अपनी कमियाँ ढूँढा करता है अनमोल
ऐसे ख़ुद को ख़ुद से बेहतर करता है

- के. पी. अनमोल

मुअत्तर= खुशबूदार, सुख़नवर= साहित्यकार, मुनव्वर= रौशन, पेशानी= ललाट, बोसा= चुम्बन

Wednesday, 20 July 2016

ग़ज़ल-


कभी आँगन में ग़ुरबत बोलती है
कभी सर चढके शोहरत बोलती है
अगरचे छाँव है तो धूप भी है
कई रंगों में क़ुदरत बोलती है
कोई अरमां अधूरा है तेरा क्या?
तेरे लहज़े में हसरत बोलती है
हर इक झगड़े का हल मुझ में है ढूंढो
ज़माने से मुहब्बत बोलती है
क़लम के रास्ते बदलाव लिक्खूं
लहू में अब बग़ावत बोलती है
कहीं पे रेहन रख आऊं मैं ज़ेवर
ज़ुबां चुप है, ज़रूरत बोलती है
घुटन इस शहर में बढ़ने लगी क्या
मेरे अंदर से हिज़रत बोलती है
कभी बैठो यहाँ और ख़ूब चहको
परिंदों से मेरी छत बोलती है
चलो अनमोल को मिलकर पुकारें
जिगर से आज शिद्दत बोलती है
- के. पी. अनमोल

16 जुलाई, 2016

Saturday, 9 July 2016

ग़ज़ल-


हज़ारों दर्द मेरे ढल गये अश’आर में आकर
ग़ज़ल ख़ुश हूँ बहुत ही मैं तेरे दरबार में आकर
भटकती जा रही थी ज़िंदगी अब तक अँधेरे में
मुनव्वर हो गयी राहें तुम्हारे प्यार में आकर
हवस, दादागिरी, हत्या, डकैती, रेप, ग़द्दारी
डराते हैं हमेशा ही मुझे अखबार में आकर
हमें भेजा ख़ुदा ने है यहाँ इक ख़ास मक़सद से
बताओ क्या किया तुमने भला संसार में आकर
नयी दुल्हन को सब मिलकर बराबर प्यार से सींचो
पनपते देर लगती है नए घर-बार में आकर
मुसलसल लड़ रही है नाव खुलकर आज लहरों से
हुई है आजमाइश जोश की मँझधार में आकर
इसे तो जब समंदर की हदें भी कम पड़े अनमोल
रहेगी किस तरह मछली तुम्हारे जार में आकर

- के.पी. अनमोल

Wednesday, 25 May 2016

ग़ज़ल

माँ की बातें गाँठ बाँध कर लौटा है
कुछ सौगातें गाँठ बाँध कर लौटा है

धूप न सर तक आयेगी अब शह्रों की
चाँदनी रातें गाँठ बाँध कर लौटा है

अबके जीत यक़ीनन समझो है उसकी
पिछली मातें गाँठ बाँध कर लौटा है

मुमकिन है के अब धरती की प्यास बुझे
वो बरसातें गाँठ बाँध कर लौटा है

संगत में अपनों की कुछ पल क्या बैठा
कितनी घातें गाँठ बाँध कर लौटा है

अभी अभी माज़ी से यादों की अनमोल
कुछ बारातें गाँठ बाँध कर लौटा है

- के.पी. अनमोल

Saturday, 21 May 2016

ग़ज़ल

एक क़िस्सा क्या अधूरा रह गया
ज़ीस्त का नक्शा अधूरा रह गया

वक़्त ने हर बार समझाया मगर
ज़ात का झगड़ा अधूरा रह गया

फिर सहन ये एक हो पाया नहीं
माई का सपना अधूरा रह गया

पीठ से ख़ंजर ने कर ली दोस्ती
और फिर बदला अधूरा रह गया

ज़ख्म जो था भर चुका कब का मगर
ये किरच-सा क्या अधूरा रह गया

तुम मिरे होकर रहे अनमोल और
भीड़ का गुस्सा अधूरा रह गया


- के. पी. अनमोल

Sunday, 8 May 2016

ग़ज़ल- ज़रा सोचिये

ज़रा सोचिये क्या से क्या हो गई
महब्बत तुम्हारी नशा हो गई

मेरा जिस्म परवाज़ करता रहा
हवा रूह लेकर हवा हो गई

पता तेरे दर का पता जब चला
तलब ख़ुल्द की लापता हो गई

मेरे पैर के आबले देखकर
रुकावट भी खुद रास्ता हो गई

अचानक हर इक काम बनने लगा
मेरे हक़ में किसकी दुआ हो गई

किसी रोज़ अनमोल कह दे ये तू
तेरा दिल चुरा कर ख़ता हो गई

- के. पी. अनमोल
ख़ुल्द= जन्नत, आबले= छाले

Thursday, 28 April 2016

ग़ज़ल- बात इतनी सोचना तुम

बात इतनी सोचना तुम हड़बड़ी को छोड़कर
चाँद पाकर क्या करोगे आदमी को छोड़कर

हाथ में उनके फ़कत तारीकियाँ ही रह गयीं
तुमसे पहले जो गये थे रोशनी को छोड़कर

ख़ाक पे आये तो आके ख़ाक में ही मिल गये
वो सफ़ीने जो कि आये थे नदी को छोड़कर

साथ देना चाहते हो साथ रहकर तो सुनो!
सब गवारा है मुझे धोखाधड़ी को छोड़कर

खेल, मस्ती, दोस्त, बचपन अब भी हैं दिल में बसे
दिन मगर चलते बने हैं इक कमी को छोड़कर

शाम गुज़री झील की गोदी में सूरज डाल के
यूँ लगा दादी चली है पोटली को छोड़कर

इस तरह अनमोल मुझमें हो गयी शामिल ग़ज़ल
जी रहा हूँ मैं उसे ही अब ख़ुदी को छोड़कर

- के. पी. अनमोल

Saturday, 23 April 2016

ग़ज़ल- मेरे सपने को तुम धोखा कहोगे

मेरे सपने को तुम धोखा कहोगे
अगर सच हो गया तो क्या कहोगे?

खड़ी की हैं हमीं ने ये दीवारें
कहो, अब भी इन्हें रस्ता कहोगे?

अदा मैंने किया है हक़ समझकर
न जाने तुम इसे क्या क्या कहोगे!

मैं अपनी रूह तुमको सौंप दूंगा
किसी दिन तो मुझे अपना कहोगे

मेरे संग बैठने की शर्त है इक
मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा कहोगे!

फ़सादों की यहाँ बस एक जड़ है
वही शय जिसको तुम पैसा कहोगे

तुम्हें अनमोल कह दे तीन आखर
पलटकर तुम उसे फिर क्या कहोगे?

- के.पी. अनमोल

Friday, 8 April 2016

ग़ज़ल- सच कहा तो

सच कहा तो झूठ को धक्का लगा
सच बताना! आपको कैसा लगा?

टूटकर जब गिर पड़े सब घोंसले
तब हवाओं को बड़ा सदमा लगा

है अलग बेटी का अपना इक वजूद
पर मुझे तो तेरा इक हिस्सा लगा

इक दफ़ा मुड़कर के देखेगी मुझे
झूठ था, बे-इंतहा सच्चा लगा

शाम, तनहाई, तुम्हारी याद, मैं
ख़ुशबुओं का घर मेरे मजमा लगा

ढह गयी दीवार इतना बोलकर
बाँटना घर को किसे अच्छा लगा

ये बता अनमोल इस बाज़ार में
मोल मेरी ज़ात का कितना लगा?

- के. पी. अनमोल

Wednesday, 23 March 2016

ग़ज़ल- सफ़ीना हर दफ़ा












ग़ज़ल-

सफ़ीना हर दफ़ा कोई किनारा ढूँढ लेता है
न हो माकूल मौसम फिर भी धारा ढूँढ लेता है

हवाओं का कि लहरों का या फिर बस एक तिनके का
जिसे हो पार होना, वो सहारा ढूँढ लेता है

बहुत मासूम है दिल गर बिछड़ जाये कोई अपना
फ़लक पर नाम का उसके सितारा ढूँढ लेता है

समंदर जज़्ब सीने में किये, यादों के जंगल में
मेरा मन क्यूँ गुजिश्ता वक़्त सारा ढूँढ लेता है

तड़पता है, मचलता है सहारा जब नहीं मिलता
मेरा ग़म मेरे सीने में गुज़ारा ढूँढ लेता है

मरासिम हैं तेरे अनमोल से क्या, ये नहीं मालूम
मगर जब दर्द हो, कंधा तुम्हारा ढूँढ लेता है

- के.पी. अनमोल

सफ़ीना= बेड़ा, माकूल= उचित, गुजिश्ता= बीताहुआ, मरासिम= संबंध